मोटे लंड की प्यासी घरवाली को साहब ने चोदा- 1 (Sex Kahani Hindi)



सेक्स कहानी हिन्दी में हमारी कम्पनी में एक साहब चेकिंग करने आये. मैं उनका ड्राईवर था. शाम को उन्होंने पूछा कि कोई लड़की मिल सकती हो तो.


सभी पाठकों को मेरा दिल से प्रणाम! मैं दिव्येश हूँ, राजस्थान के पाकिस्तान बॉर्डर के पास बाखासर (बाड़मेर जिला) का रहने वाला.


मेरी उम्र 28 साल है और मेरी बीवी निशा, जो 24 साल की है, मेरे दिल की धड़कन है.


मैं एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में ड्राइवर और साइट सुपरवाइजर का काम करता हूँ जबकि निशा घर की दुनिया को अपने प्यार और मेहनत से सँवारती है.


ये सेक्स कहानी उस रोमांचक मोड़ की है जब हमारी ज़िंदगी में एक गुजराती साहब आए और हमारी दुनिया को हिलाकर रख दिया.


जी हां, ये कहानी है मेरी और निशा की उस रात की जब हम दोनों के बीच की गर्माहट ने नया रंग लिया.


अब मैं आपको पूरी नो सेक्स कहानी हिन्दी विस्तार से सुनाता हूँ और ये बात मैं दिल से कहता हूँ कि इसका हर एकदम शब्द सच्चा है.


मेरी कंपनी में गुजरात से एक साहब आए, उनका नाम विशाल था.

विशाल सर का काम ऑडिट और चेकिंग का था.


वे उम्र में शायद 45-50 के आसपास होंगे.

लेकिन उनकी बातों में एक ऐसी चमक थी जो किसी को भी अपनी ओर खींच ले.


सर के चेहरे पर एक अजीब सी मस्ती वाली कसक, जो साफ साफ चुगली करती थी कि साहब रसिया किस्म के हैं.

यह बात मैं और भी खुल कर लिख सकता हूँ क्योंकि मैंने उनके साथ जो अनुभव किया था, वह तो एकदम आईने की माफिक साफ साफ था कि साहब को चुत चुदाई का और मौका पड़े तो किसी लौंडे की गांड मारने का खूब शौक था.


उस दिन मैं पूरा दिन सड़क के काम में उलझा रहा.

साइट पर धूल-मिट्टी के बीच पसीना बहा रहा था.


शाम को अचानक कंपनी से फोन आया कि विशाल सर को गाड़ी में होटल छोड़ दो और कहीं बाहर खाना भी खिला लाओ.


मैं सर को लेकर निकला.

हमारा इलाका बॉर्डर का है, यहां न ज्यादा रौनक है, न ही चमक-दमक.


एक छोटा-सा रेस्टोरेंट था, सोचा वहीं ले चलता हूँ.

लेकिन वहां की खराब साफ-सफाई देखकर सर का मूड कुछ ठीक नहीं हुआ.


उन्होंने कहा- दिव्येश, ये क्या जगह ले आए? गर्मी का मौसम है, कुछ और करो. कहीं घुमा दो.

अब यहां घूमने को क्या? न पार्क, न मॉल, बस रेगिस्तान की हवा और सन्नाटा.


मैंने उन्हें बताया कि इधर शहर जैसा कुछ नहीं है सर!

फिर सर ने कहा- चलो, होटल ही छोड़ दो. मैं वहां खाने का जुगाड़ कर लूँगा.


रास्ते में सर ने मुझसे ढेर सारी बातें कीं.

उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी गर्मी थी, जैसे वे हर बात को और गहरा कर देना चाहते हों.


अचानक वे बोले- यार, यहां कोई मज़ेदार जगह है? कोई … खास लड़की मिलती है क्या?

मैं थोड़ा हक्का-बक्का रह गया.

मैंने हंसते हुए कहा- सर, यहां ऐसा कुछ नहीं मिलता. न लड़की, न रंडी. नो सेक्स!


मेरी बात सुनकर सर ने मुझे एक गहरी नज़र से देखा, जैसे मेरी बात का मज़ा ले रहे हों.

फिर बोले- अरे, तुम तो ड्राइवर हो, लोकल आदमी हो. तुम्हें तो सब पता होना चाहिए! अच्छा, ये बता, तुम्हें क्या पसंद है?


मैंने सोचा, अब क्या छुपाना?

मैंने खुलकर कहा- सर, मुझे तो सब पसंद है. सच कहूँ तो मैं लड़कों को भी पसंद करता हूँ. मैं समलैंगिक रिश्तों में भी रहा हूँ. पिछले महीने अहमदाबाद में था, वहां एक दोस्त के साथ कुछ पल बिताए थे.


मेरी बात सुनकर सर की आंखों में एक चमक सी आई.

वे बोले- अच्छा! सबकी अपनी-अपनी पसंद होती है, दिव्येश.


फिर वे गाड़ी से उतरे और होटल की ओर चले गए.

जाते-जाते मैंने अपना नंबर दे दिया- सर, कुछ ज़रूरत हो तो कॉल कर लेना.


सर ने मुस्कुराते हुए कहा- तू क्या ज़रूरत पूरी करेगा? मैं यहां जुगाड़ कर लूँगा.

यह कह कर हंसते हुए उन्होंने मेरा नंबर भी ले लिया.


शाम के करीब 8 बजे मैं घर पहुँचा.

हमारा घर छोटा-सा है, लेकिन निशा ने उसे अपने प्यार से रंगीन बना रखा है.


वह रसोई में खाना बना रही थी, उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ था और चेहरे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं.


उसने मुझे देखा और थोड़ा गुस्से में बोली- तुमने फोन भी नहीं किया! कब का खाना तैयार करके रखा है.

मैंने हंसते हुए सर की सारी बात बताई.


मेरी नौकरी ऐसी है कि टाइम फिक्स नहीं.

कभी जल्दी घर आ जाता हूँ, तो कभी देर रात तक काम करना पड़ता है.

कंपनी की गाड़ी भी मेरे पास ही रहती है.


निशा और मेरी ज़िंदगी में प्यार तो बहुत है लेकिन कुछ कमी भी है.


मैं हफ्ते में दो-तीन बार ही निशा के करीब आ पाता हूँ. मेरा मूड हमेशा नहीं बनता.

मेरा लंड 6 इंच का तो है, लेकिन जल्दी थक जाता है.

मैं अक्सर बहाना बना लेता हूँ कि आज थक गया हूँ और सो जाता हूँ.


निशा को ये बात खटकती है.


उस रात भी जब मैं बिस्तर पर लेटने जा रहा था, निशा ने ताना मारा- क्या, आज भी थक गए?

उसकी आवाज़ में शिकायत थी, लेकिन आंखों में एक चमक थी, जैसे वह कुछ और कहना चाहती हो.


मैं चुपचाप मुस्कुराया और सोचा- क्या करूँ? निशा मेरे साथ मेरे घरवालों की इज़्ज़त की खातिर है. और मैं … मैं शायद उसे वह ख़ुशी नहीं दे पाता, जो वह चाहती है.


बस ऐसे ही दिन बीत रहे थे, जैसे रेगिस्तान की रेत हवा में उड़ती है.


तभी दूसरे दिन रात को विशाल सर का फोन आया.

उनकी आवाज़ में एक अजीब-सी बेचैनी थी.


वे बोले- यार दिव्येश, इस होटल में तो जीना मुहाल है! एसी काम नहीं कर रहा, पंखा खटखट की आवाज़ कर रहा है और गर्मी से हालत खराब है. ये लोकल होटल रुकने लायक भी नहीं. कोई और जगह बता, जहां सुकून मिले.


मैंने एक पल सोचा और निशा को बता दिया कि सर को लेने जा रहा हूँ.


निशा, जो हमेशा दूसरों का ख्याल रखती है, बोली- अरे, तुम्हारे सर ने अभी तक खाना भी नहीं खाया होगा. ये टिफिन ले जाओ, उन्हें खिला देना. और हां, तुम भी कुछ खा लेना, फिर कहीं होटल में छोड़ देना.


मैं गाड़ी लेकर होटल पहुँचा.

विशाल सर बाहर खड़े थे, चेहरे पर हल्की-सी झुंझलाहट.


मुझे देखते ही बोले- दिव्येश, मैंने इस होटल को मना कर दिया. यहां पांच दिन तो क्या, पांच घंटे भी नहीं रुक सकता. ऑनलाइन आसपास कोई दूसरा होटल भी नहीं दिख रहा. अब तू बता, क्या करूँ?


मैंने सोचा और कहा- सर, मैं आपको बाड़मेर छोड़ देता हूँ, लेकिन वह 100 किलोमीटर दूर है.

फिर मैंने आगे कहा- वैसे, मेरा खाना बाकी है. आप चाहें तो मेरे घर चलें, कुछ खा लें. फिर आप बताइए, कहां जाना है.


सर ने एक पल सोचा और बोले- ठीक है, चल. तू खाना खा ले, मैं बाद में कंपनी ऑफिस में ही सो जाऊंगा. 200 किलोमीटर का रास्ता, वह भी इन खराब सड़कों पर, बहुत वक्त लेगा.


मैं सर को लेकर घर पहुँचा.

घर में निशा की रसोई से हल्की-सी मसालों की खुशबू आ रही थी.


मैंने सर को खाने के लिए बुलाया, लेकिन वे बोले- नहीं यार, मैं ठीक हूँ.


मैं तो भूखा था, सो खाने बैठ गया.

निशा ने देखा कि सर गाड़ी से उतरे ही नहीं.

उसका दिल तो ऐसा है, मेहमान को भूखा कैसे छोड़ दे?


वह बाहर गई और बड़े प्यार से आग्रह किया- सर, अन्दर आइए न. थोड़ा-सा खाना तो खा लीजिए.

निशा की मीठी आवाज़ और उसकी आंखों की गर्मजोशी ने सर को मना करने का मौका ही नहीं दिया.


आखिरकार वे अन्दर आ गए.


मैं और विशाल सर खाने की मेज पर बैठ गए.

निशा ने बाजरे का रोटला, दही और मसालेदार फ्राई बनाया था.


सर ने पहला निवाला मुँह में रखा और उनकी आंखें चमक उठीं.

वे बोले- वाह! ये तो लाजवाब है!


निशा ने मुस्कुराते हुए कहा- सर, कल मैं दाल-बाटी और चूरमा बनाऊंगी. आप फिर आ जाना.


सर ने हंसते हुए मेरा मज़ाक उड़ाया- अरे, दिव्येश को शायद बुरा लग जाए. मैं आज भूख से मर रहा था, लेकिन इसने तो एक बार भी नहीं कहा कि सर, घर आ जाओ.


मैं हंसा और चुपचाप खाना खाने लगा.


लेकिन सर और निशा की बातें रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं.

दोनों दोस्तों की तरह हंस-हंसकर बातें कर रहे थे.


खाने के बाद सर ने हमारा घर देखा. बोले- दिव्येश, तेरा घर तो बहुत अच्छा और बड़ा है.


मैं मन ही मन सोच रहा था कि सर को अब कंपनी ऑफिस छोड़ दूँ, कहीं ये रुक गए तो निशा को अपनी गोद में बिठा लेंगे.


लेकिन दूसरी तरफ एक और ख्याल था कि अगर सर रुके, तो शायद मुझे भी कुछ मज़ा मिल जाए.

मेरे मन में वह अहमदाबाद वाली रातें तैर रही थीं, जब मैंने समलैंगिक सुख का स्वाद चखा था.


रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे.


सर बोले- चल भाई, मुझे कंपनी ऑफिस छोड़ दे. तू यहां अपने घर में मज़े कर. मेरे नसीब में शायद ये घरेलू सुख नहीं.


मैंने गाड़ी स्टार्ट की ही थी कि निशा ने टोक दिया.

उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी गर्मी थी.


वह बोली- सर, ये आपका भी घर है. रुक जाइए. वैसे भी यहां तीन कमरे हैं. आप आराम से रह सकते हैं.


विशाल सर तो जैसे यही चाहते थे.

उनकी आंखों में एक चमक सी आई.

वे बोले- ठीक है, जब तुम इतना कह रही हो, तो रुक जाता हूँ. मैं चुपचाप गाड़ी बंद करके घर में आ गया.


निशा ने एक कमरे में दो बिस्तर और गद्दे लगा दिए.


सर ने मज़ाक में कहा- अरे, ये दो बिस्तर किसके लिए?

निशा ने हंसते हुए जवाब दिया- दिव्येश भी आपके पास सो जाएगा. आपको अच्छा लगेगा.


सर ने तपाक से बीच में टिप्पणी की- अरे, मेरी वजह से बेचारा आज यहां? निशा, तुझे कोई दिक्कत तो नहीं?

निशा ने भी तुरंत जवाब दिया- नहीं सर, यही ठीक है. वैसे भी ये मेरे पास आएगा तो क्या करेगा?


उसकी बात में एक ताना था जो मेरे दिल को चुभ गया.

वह हंसती हुई चली गई.


मैं और विशाल सर कमरे में लेट गए.

लाइट बंद थी लेकिन मेरे मन में उथल-पुथल मची थी.


मैंने मोबाइल ऑन किया और कुछ वीडियो देखने लगा.


तभी सर का पैर मेरे कूल्हों पर हल्के-हल्के घूमने लगा.

मेरे दिल की धड़कनें तेज़ हो गईं.

मैं समझ गया कि आज रात कुछ खास होने वाला है.


मैंने मोबाइल साइड में रखा.

सर ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा और अपने तगड़े औज़ार पर रखवा दिया.


वह लोहे की तरह सख्त और गर्म था.

मेरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ गई.


सर ने धीमी आवाज़ में कहा- लड़की नहीं मिली तो क्या, तू तो है ना. तुझे भी तो लड़के पसंद हैं, है ना?

मैंने हल्के से ‘हां’ कहा.


सर ने मुझे उनके औज़ार को हिलाने और चूसने को कहा.

मैंने धीरे-धीरे शुरू किया.


हर पल मज़ा दोगुना होता जा रहा था.

मैंने अपने सारे कपड़े उतार दिए और पूरी तरह से उस पल में डूब गया.


सर का मस्त, तगड़ा औज़ार मेरे हाथों में था और मैं उसका हर इंच महसूस कर रहा था.

मेरे मन में आज बड़ा उल्लास था कि सर का लंड मेरी गांड की खुजली को दूर कर देगा.


दोस्तो, इस सेक्स कहानी हिन्दी में मैं आपको विस्तार से बताऊंगा कि उस रात ऐसा क्या हुआ जिससे सर को मेरी बीवी की चुत पसंद आ गई.


आप मेरी नो सेक्स कहानी हिन्दी को पूरा पढ़ने के लिए इस पटल से जुड़े रहें.

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नो सेक्स कहानी हिन्दी का अगला भाग: मोटे लंड की प्यासी घरवाली को साहब ने चोदा- 2


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