ससुराल में ननद की वासना का खेल : Sister In Law Xxx Kahani



सिस्टर इन लॉ Xxx कहानी में मेरे ससुर मेरे ऊपर फ़िदा थे. मैं भी उनके साथ सेक्स का मजा लेना चाहती थी. पर मेरी कुंवारी ननद घर में थी तो उससे डर बना रहता था.


प्रिय पाठको,

आपने मेरी पिछली कहानी

कुंवारी ननद के अन्दर भड़कायी लण्ड की प्यास

में पढ़ा कि अपनी ससुराल में मैंने अपनी कुंवारी ननद को पोर्न मूवीज़ दिखा कर उसकी अन्तर्वासना को जगाया और उसके साथ लेस्बियन सेक्स करके उसे लंड की तलब लगायी.


अब आगे सिस्टर इन लॉ Xxx कहानी:


इसी तरह अब हमेशा होने लगा कि रोहित के आने पर पायल खिड़की से हम दोनों की चुदाई देखती और फिर उनके जाने के बाद हम दोनों रात में मजे करते।


इस बीच पायल के अंदर लण्ड की तड़प बढ़ती जा रही थी।


पायल के लिए ही मैंने खिड़की के पर्दे को परमानेंट ऐसा कर दिया था कि वह आराम से खिड़की अंदर देख सकती थी।

कमरे के अंदर से पता भी नहीं चलता था कि बाहर से अंदर दिखाई भी दे सकता है।


वहीं रोहित के जाने के बाद जब मैं और पायल साथ सोती थी तो हम पॉर्न मूवी ज़रूर देखती थी।

पहले तो मैं कभी-कभी एक-दो बार फेमिली सेक्स मूवी चलाती थी लेकिन धीरे-धीरे मैं जानबूझकर सिर्फ फेमिली सेक्स मूवी ही प्ले करने लगी थी जिसमें भी ज्यादातर बाप-बेटी और भाई-बहन के सेक्स की मूवी ही चलाती थी।


हम दोनों कभी या पहले ही पूरी कपड़े उतार कर नंगी होकर ही मूवी देखती थी या फिर कभी-कभी मूवी देखते हुए जब एक्साइटमेंट बढ़ने लगती थी तब धीरे-धीरे कपड़े उतार कर नंगी हो जाती थी।


मूवी देखते हुए हम लेस्बियन सेक्स भी करती रहती थी।

जिसमें एक एक-दूसरे की चूत सहलाना, रगड़ना, चाटना, चूचियों को चूसना सब शामिल रहता था।


एक बार जब रोहित के जाने बाद हर बार की तरह रात में पायल मेरे कमरे में आयी।

दरवाजा बंद कर हम दोनों बेड पर आ गई।


मैं हमेशा उससे पूछती कि कैसा लगा हम दोनों का सेक्स या फिर चूत का पानी निकला या नहीं।


इस बीच मैंने पायल की चूत में एक उंगली के बजाय अब दो उंगली डालना शुरू कर दिया था।


उसके बाद धीरे-धीरे दो-तीन बार गाजर या मूली थोड़ा-थोड़ा चूत में अंदर डालकर चूत को थोड़ा-थोड़ा बड़ा कर रही लगी थी।

सिस्टर इन लॉ Xxx पायल को भी बेहद मजा आने लगा था।


मैं उसे बातों-बातों में और ज्यादा उकसाती रहती थी कि लण्ड का मजा ही अलग होता है.


सोचो जब उंगली या गाजर-मूली से इतना मजा मिलता है तो असल में कितना मजा मिलता होगा।


इस तरह की बातें करके मैं पायल के अन्दर लण्ड की प्यास और भड़काती रहती थी।

इसी के साथ ही बाहर किसी के साथ चुदाई करने को लेकर भी डराती रहती थी।


हालांकि पायल खुद लड़कों से ज्यादा बात नहीं करती थी.

यहाँ तक कि वह तो रिश्तेदारों के लड़कों से भी ज्यादा बात नहीं करती थी।


लेकिन फिर भी मैं इस डर से कहीं चूत की आग बुझाने के चक्कर में कहीं बाहर किसी लड़के से चुदवा ले इसलिए मैं हमेशा पकड़े जाने और ब्लैकमेलिंग आदि किस्सों से डराती रहती थी।


खैर … इसी तरह करीब 15 दिन गुजर गये।


एक दिन जब रोहित आए हुए थे सुबह नाश्ते के दौरान बुआ जी ने रोहित से कहा- बेटा डेढ़-दो महीने रह ली हूँ यहाँ … अब मुझे घर पहुँचा दे किसी दिन!


मैं किचन में थी.

जैसे ही मैंने यह सुना मैं तो मन ही मन खुश हो गयी कि चलो अब ससुर जी के साथ कुछ बात आगे बढ़ सकती है।


वहीं जैसे ही बुआ जी ने ये बात बोली, तभी सुसर जी ने कहा- हाँ रोहित, दीदी सही कह रही हैं। उनके घर पर भी दिक्कत हो रही है सबको. तो ड्यूटी पर जाने से पहले टाइम निकाल कर पहुँचा दे।


ससुर जी की बात सुनकर मैं मन ही मन हंस दी।

मैं तो समझ रही थी कि मुझसे ज्यादा जल्दी तो ससुर जी को है बुआ जी के जाने की!


खैर … अगले दिन ही सुबह के समय रोहित कार से बुआ जी को लेकर उन्हें छोड़ने चले गये।


बुआ जी के यहां जाने में दो-ढाई घण्टे लगते थे।


चूंकि रोहित को अगले दिन ही फिर से ड्यूटी पर जाना था तो वे बुआ जी को छोड़कर शाम तक वापिस आ गये।


उनके जाते ही ऐसा लग रहा था कि जैसे खुली हवा में साँस ले रही हूँ।


मेरी चूत नयी उम्मीद में खुशी से अपने आप ही कुलबुलाने लगी।


सुबह चाय भी बनाती तो मैं ही थी लेकिन ससुर जी के कमरे चाय देने पायल ही जाती थी।

उसके बाद भी ससुर जी खाना वगैरह खाकर ऑफिस निकल जाते थे।


जैसा कि मैंने शुरू में ही बताया था कि ऐक्सीडेंट के बाद पैरों में दिक्कत की वजह से वे तेज नहीं चलते थे।


बस सुबह ऑफिस जाना होता था तो नाश्ता डायनिंग टेबल पर और शाम की चाय वे बाहर बरामदे में बैठकर ही पीते थे।


बाकी सुबह की चाय और रात का खाना वे ज्यादातर अपने कमरे में ही खाते थे।

कभी-कभी मूड होता तो डायनिंग टेबल पर आ जाते थे खाने!


चाय देने से लेकर खाना देना और रात के लिए पानी रखने तक का सारा काम पायल ही करती थी।

लेकिन अब मुझे किसी तरह पायल का काम अपने हाथों में लेना था।


पर कैसे शुरू करूँ … समझ में नहीं आ रहा था.

पायल से सीधा बोल भी नहीं सकती थी।


बुआ जी को गये 4-5 दिन हो चुके थे।


एक दिन रविवार को सुबह मेरी नींद जल्दी खुल गयी।

टाइम देखा तो सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे अभी!


रोहित नहीं थे तो पायल रात में मेरे साथ ही सोयी थी।


पहले सोचा कि सो जाऊं … इतनी जल्दी उठकर क्या करूँगी।

फिर सोचा कि पायल को जगाकर चाय बनाने चली जाती हूँ।


अचानक मेरे दिमाग में एक ख्याल आया।


मैंने धीरे से उठकर दरवाजा खोलकर बाहर झांका तो देखा कि ससुर जी के कमरे का दरवाजा खुला था।

मैं समझ गयी कि वे उठ चुके हैं।


पायल की देर तक सोने की आदत थी।

वह 8 बजे के बाद ही सोकर उठती थी और आज रविवार था तो वैसे भी थोड़ा देर तक सोती है।


पिछली रात हम दोनों ने देर तक मस्ती की थी और काफी देर से सोई थी इसलिए वैसे भी वह जल्दी उठने वाली नहीं थी।


दरअसल ससुर जी रोज सुबह करीब 5.00 बजे तक उठ जाते हैं और फिर फ्रेश वगैरह होने के बाद वह 6 बजे तक टहलने चले जाते हैं।


करीब 7 बजे तक लौटने के बाद बाहर लॉन में बैठकर ही पेपर पढ़ते हैं और सुबह की चाय भी वहीं पीते हैं।


मैंने धीरे से नाउट गाउन उतारा और सलवार-कुर्ता और दुपट्टा पहन कर बिना पायल को जगाए किचन में चाय बनाने चली गयी।

चाय बनाने के बाद मैं वापस कमरे में आयी तो देखा पायल सो रही थी।


मेरे पास यही मौका था … मैं किचन में गयी और ससुर जी की चाय लेकर उनके कमरे की तरफ गयी।


मैं शादी के बाद पहली बार उनके कमरे में जा रही थी तो दिल जोर धड़क भी रहा था।


दरवाजे पर पर्दा लगा था, मैंने बाहर से ही आवाज़ दी- पापा चाय लाई हूँ आपके लिए!


अन्दर से जैसे ही ससुर जी ने मेरी आवाज़ सुनी तो बोले- अरे बेटा तुम … आ जाओ अन्दर आ जाओ।


मैं पर्दा हटाकर अन्दर गयी तो देखा कि कमरे में ट्रैक सूट पहने ससुर जी जूते पहनने जा रहे थे।


मैंने चाय टेबल पर रख दी।


मुझे देखते ही वे बोले- आज बहुत जल्दी चाय बना दी।

मैं बोली- जी डैडी … नींद जल्दी खुल गयी थी तो चाय बना दी।


ससुर जी बोले- बहुत अच्छा किया कि तुम लेकर आ गयी चाय! शादी के बाद से मौका ही नहीं मिल पाया था तुमसे बात करने का!

फिर बोले बोले- बैठ जाओ बेटा।


थोड़ा कन्फर्म होते हुए पापा धीरे से बोले- पायल तो सो रही है ना अभी?

मैं निश्चिंत थी कि पायल तो सो ही रही है यही मौका है थोड़ा बातचीत आगे बढ़ाने का!


इसलिए मैं हाँ में सिर हिलाते हुए थोड़ा शरमाने का नाटक करते हुए सोफे के ठीक बगल बेड पर बैठ गयी।


उधर ससुर जी भी शायद काफी दिनों से इसी इंतज़ार में थे तो वे भी बेहद उत्साहित हो गये थे।


मेरे बैठते ही ससुर जी मेरी पीठ पर हाथ रख दिये और धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए बोले- यहाँ मन लग रहा है ना, कोई दिक्कत तो नहीं?

मैं हल्के से मुस्कुराते हुए बोली- जी, कोई दिक्कत नहीं होती। अच्छा लग रहा है यहां!


ससुर जी बोले- चलो अच्छा है।


शादी के बाद से पहली बार हम एक-दूसरे से बातचीत कर रहे थे.

वहीं शादी के एक-दो महीने पहले से भी हमारी मुलाकात नहीं हुई थी।


तो ससुर जी भी और मैं भी थोड़ा अभी एक-दूसरे से खुल नहीं पा रहे थे।

इसलिए क्या बात करें कुछ समझ में नहीं आ रहा था।


वहीं दूसरी तरफ पायल के जगने का भी डर था मन में!


लेकिन ससुर जी ने अपना हाथ पीठ से नहीं हटाया था और धीरे-धीरे मेरी पीठ को लगातार सहला रहे थे।


कुछ सेकेण्ड चुप रहने के बाद ससुर जी बोले- अच्छा लगा कि तुम चाय लेकर आयी। इसी बहाने तुमसे बात हो गयी।

मैं धीरे से बोली- जी कोशिश करुंगी आगे से कि मैं आपको सुबह जल्दी दे दिया करूँ चाय!


ससुर जी मेरी इस बात पर थोड़ा खुश होते हुए बोले- हाँ बेटा, इसी बहाने थोड़ा तुमसे बात भी हो जाया करेगी।


इतनी देर की बात में ही ससुर जी थोड़ा खुलने लगे थे और उनके अंदर थोड़ी सी हिम्मत आ गयी थी।

वे अपने हाथ को मेरी पीठ से हटा कर धीरे से मेरी सलवार-कुर्ते के ऊपर से ही मेरी जांघ पर रखते हुए बोले- तुम्हें कभी-भी किसी भी चीज की ज़रूरत हो तो मुझसे कह देना शर्माना मत!


ससुर जी अपने हाथ को बिना हिलाए-डुलाए मेरी जांघ पर रखे हुए थे।

शायद वे मेरा रिएक्शन देखना चाह रहे थे कि मैं वही शादी के पहले वाली गरिमा हूँ या बदल गयी हूँ।


मैंने भी जांघों को हल्का सा फैलाकर इशारा दे दिया कि मैं अभी भी वही शादी के पहले वाली गरिमा हूँ।


जैसे ही मैंने जांघ को हल्का सा फैलाया, सुसर जी की हिम्मत थोड़ी और बढ़ गयी और वह हल्का-हल्का मेरी जांघ को सहलाने लगे और धीरे से बोले- कभी टाइम निकाल कर वैसे भी आ जाया करो। मैं तो अकेला बोर ही होता रहता हूँ।


मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था।

मैं हल्का सा मुस्कुराते हुए धीरे से बोली- जी घर में हमेशा कोई न कोई रहता है इसलिए आने का टाइम नहीं मिलता। वैसे कोशिश करूंगी।


ससुर जी मेरी इस बात पर खुश हो गये जांघ को हल्का सा दबाते हुए बोले- हाँ बेटा कोशिश करना!


मैं मन ही मन पायल के जगने से डर रही थी तो मैं तुरंत बोली- अच्छा, मैं चलती हूँ।

ससुर जी मेरी जांघ पर हाथ हटाते हुए बोले- हाँ बेटा, जाओ।


मैं जल्दी से किचन में आयी और अपनी और पायल की चाय गर्म करके सीधा अपने कमरे में गयी तो देखा पायल अभी सो रही थी।

मेरी जान में जान आयी।


मैंने चाय की ट्रे को बेड पर रखा और पायल को जगाती हुई बोली- अरे महारानी जी, उठिए चाय पी लीजिए।


पायल थोड़ा उंघती हुई उठी और मुझे सलवार-कुर्ते में और चाय देखकर बोली- अरे कब उठ गयीं आप, कपड़े भी बदल लिए, चाय भी बना दी।


मैं मुस्कुराते हुए बोली- अरे आज नींद जल्दी खुल गयी थी तो मैंने सोचा कि क्या जगाऊँ तुझे और कपड़े बदल कर चाय बनाने चली गयी। पापा को भी आज टहलने जाने से पहले ही चाय दे दी है।


फिर चाय वगैरह पीने के बाद हम अपने रूटीन काम में लग गये।


खैर उस दिन पायल ने ही ससुर जी को नाश्ता और शाम की चाय वगैरह सब दिया।


मेरे दिमाग में चल रहा था कि आज सुबह की चाय तो मैंने दी है लेकिन अगर जल्दी मैं नाश्ता-खाना देना शुरू नहीं करुंगी तो दोबारा जल्दी नहीं मौका मिलेगा.


यह कहानी 5 भागों तक चलेगी.

आप इस सिस्टर इन लॉ Xxx कहानी के प्रत्येक भाग पर अपने विचार मुझे बताते रहें.


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